कलश चक्र
उज्जयिन्याः कुंभ (पर्व) चक्रम् — चक्र, उस पर मुद्रित विवरण, और अवंतिका परिचयउज्जयिन्याः कुंभ (पर्व) चक्रम्
संक्षिप्त परिचय — चित्र पर मुद्रित पाठ
संक्षिप्त परिचय – यह चक्र व्यतीत कुम्भ पर्व सं. २०१३ वि. (सन् ५६) के अनुसंधान में सतत् रत पूज्य पिताजी स्व. पं. संकर्षणजी व्यास की उपलब्धी है। कलश के शीर्ष पर श्रीफल और उस पर पर्व के मुख्य देव बृहस्पती अपनी पर्व राशि (सिंह) के वाहन पर स्थित है। कलश के मुख पर भगवान विष्णु हिरण्यमयेन पात्रेण के अनुसार तथा कलश कंठ में रुद्र रूप से श्री महाकाल ही प्रणवाकृति से प्रदर्शित है, यहाँ महाकाल के प्रणव मय रूप में जलाधारी ‘उ’ है, मात्रा यहाँ सर्पमुख है, तथा चंद्र एवं रुद्रशिर अनुस्वार हो जाते हैं।
भगवान शंकर ने गरल पान किया था अतएव नीलकंठ हो यहाँ स्वयं अमृत मय कलश के कंठ में बैठकर गरलाग्नि शमन करते हुए, गरलहीन सर्प शिप्रा को अपने शिरस्थित सोमलेखा से सोमपान कराते हुए गंगा वतरण रूप में यहाँ महाकाल के शीर्ष से गिर कर शिप्रा अहिवलयाकार हो सम्पूर्ण क्षेत्र को वेष्ठित किये हुए हैं। सोमपान से शिप्रा सोमवती हो अमृत मयी हो रही है। अवन्ति खंड में लिखा है। सरित्सोमा समुत्पन्ना व्यासते नैव तेजसा, प्रविष्टा सा नदी शिप्रा अमृते नाति पूरिता। तत: सोमवती शिप्रा विख्याता ह्याति पुण्यदा॥
इसी चक्र में शिप्रा अपने २८ भाग में (अहिवलयाकार चक्र में) कृत्तिकादि नक्षत्र क्रम से भ्रमण करते हुए दिखाई देते हैं। प्रत्येक भाग में १-१ तीर्थ और ३-३ शिवलिंग दर्शाते हुए शिप्रा स्थित २८ तीर्थ और मुख्य ८४ लिंग इस चक्र में आ जाते हैं। कलश के कुक्षिद्वय पर सप्तसागर, एवं सप्तद्विप, सांगवेद चतुष्टय, मूल में ब्रह्मा एवं मध्य में मातृगण देते हुए ‘कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्रसमाश्रिता:’ कलश की स्तुति को यह चक्र साकार कर देता है। कलश के अन्तर्गत २८ कोठे वाला अहिवलय चक्र ही कुन्डलिनी चक्र है, सुषुम्ना यहाँ शिप्रा रूप से प्रदर्शित है। इन्हीं ८४ लिंगों से वार्हस्पत्य भ्रमण के द्वारा पर्व का स्वरूप सिद्ध हो जाता है। अतएव कलश चक्र का आध्यामिक, पौराणिक, यौगिक के साथ-साथ ज्योतिष से भी सम्बन्ध हो जाता है। अमृत बिन्दु के पतन से अमृतमयी अवन्तिका के कुम्भ पर्व पर, अमृत कलश में विजराजमान उज्जयिनी के सभी प्रमुख देवता और सभी तीर्थ के तत्व रूप से दर्शन हो जाते हैं। इस प्रकार इस चक्र के नित्य दर्शन से श्री महाकालेश्वर आदि के साथ तीर्थ के सम्पूर्ण देवताओं का स्मरण, दर्शन और पूजन का पुण्य लाभ सहज ही प्राप्त हो जाता है।
समर्पण-श्लोक — चित्र पर मुद्रित
शीर्ष पर: “हर हर महादेव शम्भो” · “अवन्ति महाकाल शिप्रे” — सं. २०१३ वि. वर्षे, वैशाख शु. १५(जैसा मुद्रित; बृहस्पति की आकृति के दोनों ओर छोटे अक्षरों में)
चक्र के आधार पर: ऋग्वेदोऽश्च यजुर्वेद: सामवेदो-ह्यश्रर्षण: । अंगैश्च सहिता-सर्वे कलशन्तु समाश्रित: । (“सामवेदो-ह्यश्रर्षण:” अत्यंत सूक्ष्म छपाई में है — यह भाग पूर्ण निश्चितता से नहीं पढ़ा जा सका, ऊपर जैसा दिखा वैसा ही रखा गया है)
कोष्ठक — चक्र के भीतर की सारणी२८ भाग · ८४ लिंग
नक्षत्र-चरण एवं उसका देवता, तथा उस भाग के तीन शिवलिंग-नाम — कृत्तिकादि क्रम से (चित्र से प्रतिलिपि)।
| नक्षत्र-पद (देवता) | शिवलिंग (३) |
|---|---|
| रे. (पुषा) | अरुणेश्वर, पुष्पदन्तेश्वर, अभिमुक्तेश्वर |
| अ. (दस्त्र) | हनुमतेश्वर, स्वप्नेश्वर, पिंगलेश्वर |
| भ. (यम:) | दुधरिश्वर, विल्वेश्वर, कायाव रोहणे (जैसा मुद्रित) |
| कृ. (अग्नि) | अगस्त्येश्वर, गुह्येश्वर, दुंडेश्वर |
| मघा (पितर) | कर्कटेश्वर, मेघनादेश्वर, महालयेश्वर |
| पू.फा. (भग) | मुक्तेश्वर, सोमेश्वर, अनर्केश्वर |
| उ.फा. (अर्य) | जटेश्यर, रामेश्वर, च्यनेश्यर (जैसा मुद्रित) |
| उ.भा. (अर्हिषु) | करभेश्वर, राजस्थलेश्वर, बटेश्वर |
| पू.भा. (अजैक) | दुर्धर्षेश्वर, प्रयागेश्वर, चंद्रादित्येश्वर |
| शत (वरुण) | केदारेश्वर, पिशाचमुक्तेश्वर, संगमेश्वर |
| रो. (ब्रह्मा) | डमरुकेश्वर, अनादिकल्पेश्वर, स्वर्णजालेश्वर |
| अश्ले. (सर्प) | नागचंद्रेश्वर, प्रतिहारेश्वर, कुक्कुटेश्वर |
| पुष्य (गुरु) | ईशानेश्वर, अप्सरेश्वर, कलकलेश्वर |
| ह. (रवि) | खंडेश्वर, पतनेश्वर, आनंदेश्वर |
| अभि (ब्रह्म) | मातंगेश्वर, सिद्धेश्वर, प्रयागेश्वर |
| श्र. (विष्णु) | सौभागेश्वर, सूपेश्वर, सहस्त्रधेनुकेश्वर |
| धनि (वसु) | पशुपतेश्वर, ब्रह्मेश्वर, जलपेश्वर |
| मृग. (सोम) | त्रिविष्टपेश्वर, कपालेश्वर, स्वर्गद्वारेश्वर |
| आ. (रुद्र) | कर्कोटेश्वर, सिद्धेश्वर, लोकपालेश्वर |
| पु. (अदि) | मनकामनेश्वर, कुटुम्बेश्वर, इन्द्रघुम्नेश्वर |
| चि. (त्वष्ठा) | कंठड़ेश्वर, इन्द्रेश्वर, मार्कण्डेश्वर |
| उ.षा. (विश्वदेव) | सिंहेश्वर, घंटेश्वर, रेवन्तेश्वर |
| पू.षा. (जल) | ॐकारेश्वर, विश्वेश्वर, नीलकंठेश्वर |
| मूल (दैत्य) | पृथुकेश्वर, स्थावरेश्वर, शूलेश्वर |
| ज्येष्ठा. (इंद्र) | अभयेश्वर, नुभेरेश्वर, वीरेश्वर |
| अनु. (मैत्र) | मंगलेश्वर, उत्तरेश्वर, त्रिलोचनेश्वर |
| वि. (इन्द्राग्नि) | कुण्डेश्वर, लम्पेश्वर, गंगेश्वर |
| स्वा. (वायु) | शिवेश्वर, कुसुमेश्वर, अंकुरेश्वर |
तीर्थ-सूची२४ / २८
चक्र की परिधि पर छोटी पीली पट्टियों में २८ तीर्थ-नाम अंकित हैं (पाठ स्वयं यही संख्या कहता है)। इनमें से २४ स्पष्ट पढ़े जा सके — शेष अत्यंत छोटे व घुमावदार अक्षरों में होने के कारण विश्वसनीयता से नहीं पढ़े जा सके, इसलिए यहाँ नहीं जोड़े गए।
अवंतिका परिचय
नीचे का परिचय पुरानी वेबसाइट के मुखपृष्ठ से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — ये पंचांगकर्ता के अपने शब्द हैं, इसलिए यहाँ पुनर्लेखन नहीं किया गया।
काल चक्र प्रवर्तकों महाकाल प्रतापनः
अवंतिका नगरी एक अत्यंत प्राचीन नगरी है। यह कालगणना की नगरी है, इसीलिए यहां महाकालेश्वर कालगणना के देवता के रूप में स्थापित है। "काल चक्र प्रवर्तकों महाकाल प्रतापनः"
यह स्कंद पुराण में लिखा है। कालगणना का प्रारंभ तबसे हुआ जब सृष्टि का आरंभ हुआ। सृष्टि का आरंभ होने से समय का आरंभ हुई और समय के आरंभ होने से कालगणना आरंभ हुई और फिर समय के मान निर्धारित किए गए जैसे कल्प, युग, वर्ष, मास, सप्ताह, दिन, रात, घटी, पल, विपल, आदि। स्कंद पुराण के अवंतिखंड में यह उल्लेखित है की सृष्टि की संरचना यहां से है और सृष्टि की रचना यहां से होने से यह अवंतिका क्षेत्र विश्व का सबसे प्राचीन क्षेत्र है। एक अरब पंचान्नवे करोड़ वर्ष सृष्टि के आरंभ को हो चुके है और यह भूमि उतनी ही प्राचीन है। लंका से सुमेरू जाने वाली रेखा (भूमध्य) एवं कर्क रेखा यही मिलती है और यह स्थान संभवतः महाकालेश्वर ही है इसीलिए भी यहां से कालगणना की जाति है। यहां कई ऐसे प्राचीन स्थान है जो कालगणना के संकेत देते है, जैसे अनादिकल्पेश्वर जो अनादि काल से या अनादि कल्प से यहां होने का संकेत देते है, वृद्धकालेश्वर पूर्व कल्प के स्वामी (महाकालेश्वर) होने का संकेत देते है, ८४ महादेव बीते ७ कल्प के १२ ज्योतिर्लिंग होने का संकेत देते है (७×१२=८४) इनके अतिरिक्त नव ग्रह, दस महाविष्णु, सप्त सागर के स्थान भी यहां विद्यमान है। इस प्रकार यह सब स्थान यहां कालगणना के संकेत देते है। भगवान श्री महाकालेश्वर का सृष्टि के आरंभ से होने का साक्ष्य भी स्कंद पुराण के दूसरे अध्याय में इस प्रकार मिलता है,
अर्थ:- "जब जल, अग्नि, वायु, सूर्य, भूमि, दिशा, नक्षत्र, प्रकाश, आकाश, चंद्र, ग्रह, देव, असुर, गंधर्व, पिशाच, नाग, सरोवर, पर्वत, नदी, समुद्र नही थे जब कुछ ज्ञात नही था ऐसे समय अकेले महाकाल ही विद्यमान थे"।
इसी पुराण में वर्णित प्रतिकल्पा शब्द से पुराण की यही ध्वनि है कि प्रत्येक कल्प में इस नगरी का अस्तित्व रहा है, प्रलय पूर्व और प्रलयांत में भी। स्कंद पुराण के अवंती खंड के प्रथम अध्याय मे माता पार्वती ने सर्वेश्वर भाग्वान् शिव से पृथ्वी पर स्थित सभि पुण्यतम स्थानो के बारे मे वर्णन करने हेतु अग्रह किया।
भाग्वान सर्वेश्वर ने निम्नलिखित स्थानों का उल्लेख किया:-
- भागीरथी गंगा
- सूर्यपुत्री यमुना
- चंद्रभागा
- वितस्ता (वर्तमान की झेलम नदी)
- अमरकण्टकस्थ नर्मदा
- कुरुक्षेत्र
- गया
- प्रयाग
- नैमिषारण्य
- केदारनाथ
- पुष्कर
- कयावरोहण
- महाकाल वन
उपरोक्त सभी तीर्थों में स्कंदपुराण में भगवान शिव ने सबसे पुण्यशाली क्षेत्र "महाकाल वन" को बताया है जहा महाकाल विद्यमान रहते है। महाकाल वन क्षेत्र में एक योजन परिमित स्थान ब्रह्महत्यानाशक, भुक्ति मुक्ति दायक तथा कलिकल्मषहारी है। और यह भी वर्णित है की यह देवदुर्लभ क्षेत्र महाप्रलय में भी नष्ट नही होता।
महाकाल वन क्षेत्र में पञ्च दिव्य गुण (विशेषताएं)
जिस स्थान पर पातकों का क्षय होता हो (पातकों का नाश होता हो) उसे क्षेत्र कहा जाता है। जहा मातृकाओं का स्थान हो उसे पीठ कहा जाता है। जिस स्थान पर मृत्यु होने पर या प्राण त्यागने पर पुनः जन्म ना होता हो उसे ऊषर कहा जाता है। जिस स्थान पर भगवान भव नित्य क्रीड़ा करते है, रुद्र नित्य वास करते है, जो भूतगण (प्राणीगण) के लिए हितकारी हो, जो महादेव का इष्ट स्थान हो, जो महादेव को प्रिय हो उसे श्मशान कहा जाता है। (श्मशान अन्य ११ क्षेत्रों को और कहा गया है जैसे अविमुक्त क्षेत्र, एकाम्र क्षेत्र, भद्रकाल क्षेत्र, करवीर वन, कोलागिरी, काशी, प्रयाग, अमरेश्वर, भरत, केदार तथा रुद्रमहालय इन स्थानों को भी श्मशान कहा गया है)
किंतु उपरोक्त पञ्च दिव्य गुण एक साथ महाकाल वन के अलावा अन्य किसी स्थान पर नही पाए जाते।
पृथ्वी पर नैमिष तथा पुष्कर तीर्थ उत्तम है, तीनों लोको में त्रिभुवन में कुरुक्षेत्र सबसे श्रेष्ठ है, वाराणसी कुरुक्षेत्र से दस गुना अधिक श्रेष्ठ एवं पुण्यदायी है, परंतु वाराणसी से भी दस गुना अधिक श्रेष्ठ एवं पुण्यप्रद महाकाल वन है।
प्रभास तीर्थ सभी तीर्थों में उत्तम है एवं पिनाकी का अद्याक्षेत्र है, श्रीशैल एवं देवदारुकावन भी उत्तम है इनसे दस गुना पुण्यशाली वाराणसी है और इस से भी दस गुना अधिक पुण्यशली स्थान महाकाल वन है, यह स्कंद पुराण के अवंती खंड में लिखा है।
हर कल्प में उज्जयिनी महाक्षेत्र के नाम-
वेद व्यास सनत कुमार से पूछते है की ऐसा कैसे है की दिव्य नगरी उज्जयनी का वर्णन सात कल्पो से होता आ रहा है।, हे मुनीश्रेष्ठ मुझे इसके नाम बताए और वे क्या है।,
तब उत्तर में सनत कुमार कहते है
हे व्यास, इस दिव्य नगरी कुशस्थली की ख्याति सुनिए,
नाम एवं कर्म दोनो में श्रेष्ठ जो ७ कल्पो से स्थित है (वास कर रही है)
- प्रथम कल्प में स्वर्णश्रृंगा
- द्वितीय कल्प में कुशस्थली
- तृतीय कल्प में अवंतिका
- चतुर्थ कल्प में अमरावती
- पंचम कल्प में चूड़ामणि
- षष्ठम कल्प में पद्मावती
- सप्तम कल्प में उज्जयिनी
सभी कल्पो के अंत होने के बाद यह पुनः इसी प्रकार नामांकित होगी (स्वर्णश्रृंगा आदि)।
स्रोत: narayanvijaypanchang.com (मुखपृष्ठ)
