नारायण विजय पंचांग
पंचांग से कुंडली, मुहूर्त एवं राशिफल तक — एक ही स्थान पर।
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महाकाल उज्जैन — काल-गणना की अधिष्ठात्री नगरी

मृत्युलोके महाकालं त्रयं लिङ्गं नमाम्यहम्॥
उज्जैन (प्राचीन अवन्तिका) भारतीय खगोल-शास्त्र का परम्परागत संदर्भ-बिन्दु रही है। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और वराहमिहिर ने उज्जैन के देशान्तर को भारतीय काल-गणना का प्रधान मध्याह्न माना — इसीलिए परम्परागत पंचांग में सूर्योदय, तिथि, नक्षत्र आदि की गणना उज्जैन के सापेक्ष की जाती है। महाकालेश्वर — द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अग्रणी — यहीं विराजमान हैं; “महाकाल” अर्थात् काल के अधिपति, अत: यह नगरी समय-गणना एवं ज्योतिष की अधिष्ठात्री मानी जाती है।
अवंतिका परिचय
नीचे का परिचय पुरानी वेबसाइट के मुखपृष्ठ से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — ये पंचांगकर्ता के अपने शब्द हैं, स्कंद पुराण के उद्धरणों सहित, इसलिए यहाँ कोई पुनर्लेखन नहीं किया गया।
काल चक्र प्रवर्तकों महाकाल प्रतापनः
अवंतिका नगरी एक अत्यंत प्राचीन नगरी है। यह कालगणना की नगरी है, इसीलिए यहां महाकालेश्वर कालगणना के देवता के रूप में स्थापित है। "काल चक्र प्रवर्तकों महाकाल प्रतापनः"
यह स्कंद पुराण में लिखा है। कालगणना का प्रारंभ तबसे हुआ जब सृष्टि का आरंभ हुआ। सृष्टि का आरंभ होने से समय का आरंभ हुई और समय के आरंभ होने से कालगणना आरंभ हुई और फिर समय के मान निर्धारित किए गए जैसे कल्प, युग, वर्ष, मास, सप्ताह, दिन, रात, घटी, पल, विपल, आदि। स्कंद पुराण के अवंतिखंड में यह उल्लेखित है की सृष्टि की संरचना यहां से है और सृष्टि की रचना यहां से होने से यह अवंतिका क्षेत्र विश्व का सबसे प्राचीन क्षेत्र है। एक अरब पंचान्नवे करोड़ वर्ष सृष्टि के आरंभ को हो चुके है और यह भूमि उतनी ही प्राचीन है। लंका से सुमेरू जाने वाली रेखा (भूमध्य) एवं कर्क रेखा यही मिलती है और यह स्थान संभवतः महाकालेश्वर ही है इसीलिए भी यहां से कालगणना की जाति है। यहां कई ऐसे प्राचीन स्थान है जो कालगणना के संकेत देते है, जैसे अनादिकल्पेश्वर जो अनादि काल से या अनादि कल्प से यहां होने का संकेत देते है, वृद्धकालेश्वर पूर्व कल्प के स्वामी (महाकालेश्वर) होने का संकेत देते है, ८४ महादेव बीते ७ कल्प के १२ ज्योतिर्लिंग होने का संकेत देते है (७×१२=८४) इनके अतिरिक्त नव ग्रह, दस महाविष्णु, सप्त सागर के स्थान भी यहां विद्यमान है। इस प्रकार यह सब स्थान यहां कालगणना के संकेत देते है। भगवान श्री महाकालेश्वर का सृष्टि के आरंभ से होने का साक्ष्य भी स्कंद पुराण के दूसरे अध्याय में इस प्रकार मिलता है,
नारायण विजय पंचांग — परिचय
नारायण विजय पंचांग उज्जयिनी की काल-गणना परम्परा में खड़ा है। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त एवं वराहमिहिर ने उज्जैन के देशान्तर को भारतीय काल-गणना का प्रधान मध्याह्न माना — इसी भूमि पर, उसी परम्परा के अनुसार, यह पंचांग प्रतिदिन की तिथि, नक्षत्र, योग, करण एवं ग्रह-स्थिति प्रस्तुत करता है।
यहाँ जो भी अंक छपता है वह इसी पंचांग की अपनी गणना से निकलता है — किसी बाहरी सेवा से कोई मान उधार नहीं लिया जाता। पाठक चाहे तो दृक् गणित से तुलना भी कर सकता है; दोनों साथ-साथ उपलब्ध हैं।
ध्येय एक ही है — शुद्ध शास्त्रीय गणना, सरल एवं सुलभ रूप में।

संवत् २०६१ — कुंभ-पर्व की गणना समझाने वाला चक्र, उसका मुद्रित विवरण तथा अवंतिका का परिचय।